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Mar 27, 2026, 10:36 AM

पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती, कांग्रेस बोली- सरकार ने तेल कंपनियों को राहत दी है, न कि जनता को

केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण आर्थिक फैसले में पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में कटौती की घोषणा की है। इस फैसले के तहत, पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी को तीन रुपये प्रति लीटर कम किया गया है, जबकि डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क को पूरी तरह से शून्य कर दिया गया है। … Read more

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Banshika Sharma

Staff Writer · Mpbreakingnews

पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती, कांग्रेस बोली- सरकार ने तेल कंपनियों को राहत दी है, न कि जनता को

Image courtesy Mpbreakingnews

केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती का ऐलान किया है। सरकार का कहना है कि यह फैसला तेल विपणन कंपनियों को बढ़ती वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों से निपटने में मदद करेगा। हालांकि, कांग्रेस ने इसे 'सुर्खियां बटोरने' और 'लोगों को बेवकूफ बनाने' वाला कदम करार दिया है, उसकी मांग है कि उपभोक्ताओं को सीधी राहत मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण आर्थिक फैसले में पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में कटौती की घोषणा की है। इस फैसले के तहत, पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी को तीन रुपये प्रति लीटर कम किया गया है, जबकि डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क को पूरी तरह से शून्य कर दिया गया है। सरकार ने इस कदम के पीछे का कारण स्पष्ट करते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) जैसी देश की प्रमुख तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। ये कंपनियां वेस्ट एशिया में जारी भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के दबाव से जूझ रही थीं, जिससे उन्हें पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर नुकसान हो रहा था। इन कंपनियों को अपनी लागत और राजस्व के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा था। इस सरकारी हस्तक्षेप का लक्ष्य कंपनियों को इस चुनौतीपूर्ण माहौल में अपनी लागतों को प्रबंधित करने में मदद करना था, ताकि वे बाजार में ईंधन की आपूर्ति और कीमतों में स्थिरता बनाए रख सकें। आम जनता को राहत नहीं, तेल कंपनियों को फायदा: कांग्रेस सरकार के इस फैसले पर तुरंत ही विपक्षी दल कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस ने इस शुल्क कटौती को केवल ‘सुर्खियां बटोरने’ और ‘लोगों को मूर्ख बनाने’ की रणनीति करार दिया है। पार्टी ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह वास्तविक रूप से उपभोक्ताओं को राहत देने पर ध्यान केंद्रित करे, बजाय इसके कि वह ऐसे कदम उठाए जिनका सीधा फायदा आम जनता को न मिले। कांग्रेस का आरोप है कि यह कदम सीधे तौर पर जनता की जेब को कोई राहत नहीं दे रहा है, बल्कि यह केवल तेल कंपनियों के वित्तीय बोझ को कम करने का एक तरीका है। कांग्रेस के मीडिया सेल के प्रमुख पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर एक विस्तृत पोस्ट साझा कर सरकार के दावों की हवा निकाल दी। खेड़ा ने अपने पोस्ट में आम जनता को आगाह करते हुए लिखा, “अगर आपने पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम होने की सुर्खियां देखीं और सोचा कि सरकार ने आपकी जेब को राहत दी है तो आप गलत हैं। फिलहाल, डीलरों और उपभोक्ताओं के लिए कीमतें समान हैं।” (पवन खेड़ा, कांग्रेस मीडिया सेल प्रमुख) उन्होंने स्पष्ट किया कि जमीन पर स्थिति बिल्कुल अलग है। खेड़ा के अनुसार, डीलरों और उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल ईंधन की कीमतें वही बनी हुई हैं, जो शुल्क कटौती से पहले थीं। इसका मतलब यह है कि खुदरा स्तर पर पेट्रोल और डीजल की दरों में कोई बदलाव नहीं आया है, और आम उपभोक्ता को पहले की तरह ही भुगतान करना पड़ रहा है। खेड़ा ने आगे बताया कि असल में जिस शुल्क में कमी की गई है, वह ‘विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क’ (Special Additional Excise Duty) है। यह वह शुल्क होता है जो तेल विपणन कंपनियां सरकार को एक निश्चित दर पर भुगतान करती हैं। इस शुल्क को कम करने का सीधा अर्थ यह है कि अब तेल कंपनियों को सरकार को कम पैसा देना होगा। यह एक तरह से कंपनियों के लिए राजस्व का नुकसान कम करने या उनके मुनाफे को सहारा देने का तरीका है। लेकिन, इससे आम आदमी की जेब पर पड़ने वाले बोझ में कोई कमी नहीं आई है, क्योंकि अंतिम बिक्री मूल्य में कोई बदलाव नहीं हुआ है। कांग्रेस का तर्क है कि सरकार ने कंपनियों को राहत दी है, न कि जनता को। राहत देने में काफी देर कर दी: कांग्रेस कांग्रेस नेता ने सरकार के इस कदम के समय पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की शुरुआत के बाद से ही तेल विपणन कंपनियां लगातार घाटे का सामना कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और रुपये के मुकाबले डॉलर की मजबूती जैसे कारकों ने इन कंपनियों के आयात बिल को काफी बढ़ा दिया था, जिससे उन्हें भारी वित्तीय नुकसान हो रहा था। खेड़ा ने कहा, “सरकार अब सिर्फ उस बोझ का एक छोटा सा हिस्सा साझा करने पर सहमत हुई है, लेकिन विशेष अतिरिक्त शुल्क को कम कर रही है, वह भी लगभग एक महीने बाद।” (पवन खेड़ा, कांग्रेस मीडिया सेल प्रमुख) उनके अनुसार, यह राहत देने में काफी देर कर दी गई है और इसका प्रभाव भी उतना व्यापक नहीं है जितना होना चाहिए था। कांग्रेस का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में कंपनियों और उपभोक्ताओं दोनों को राहत देना चाहती थी, तो उसे यह कदम बहुत पहले उठाना चाहिए था। राहत सिर्फ कहानियों में है, वास्तविकता में नहीं: पवन खेड़ा पवन खेड़ा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उपभोक्ताओं के लिए “राहत सिर्फ कहानियों में है, वास्तविकता में नहीं।” उनका यह बयान इस बात पर जोर देता है कि सरकार द्वारा पेश की गई ‘राहत’ केवल कागजी और प्रतीकात्मक है, जिसका जमीनी स्तर पर कोई ठोस असर नहीं दिख रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स और सरकारी घोषणाओं में भले ही शुल्क कटौती को एक बड़े राहत पैकेज के तौर पर दिखाया जा रहा हो, लेकिन जब उपभोक्ता पेट्रोल पंप पर जाते हैं, तो उन्हें वही पुरानी कीमतें चुकानी पड़ती हैं। यह स्थिति आम नागरिकों में भ्रम पैदा करती है और उन्हें ठगा हुआ महसूस कराती है। कांग्रेस की केंद्र सरकार से मांग कांग्रेस ने केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर सीधे घेरा है और मांग की है कि वह “लोगों को बेवकूफ बनाने के बजाय उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत देने पर ध्यान केंद्रित करे।” पार्टी का कहना है कि सरकार को ऐसे प्रभावी कदम उठाने चाहिए जिससे सीधे खुदरा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी आए। इसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क में ऐसी कटौती शामिल हो सकती है जो सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचे, या राज्य सरकारों के साथ मिलकर वैट में कमी लाने के लिए समन्वय स्थापित करना। कांग्रेस का मानना है कि जब तक ईंधन की कीमतें सीधे कम नहीं होतीं, तब तक आम जनता महंगाई के बोझ तले दबी रहेगी और सरकार का यह कदम केवल एक राजनीतिक चाल मात्र बनकर रह जाएगा। यह मांग दर्शाती है कि कांग्रेस चाहती है कि सरकार केवल कंपनियों के बहीखातों को दुरुस्त करने के बजाय, आम आदमी के बजट में सीधा सुधार लाए। संक्षेप में, केंद्र सरकार का यह कदम भले ही तेल विपणन कंपनियों के लिए एक राहत हो, लेकिन कांग्रेस इसे आम जनता के साथ एक ‘चाल’ मान रही है। पार्टी का स्पष्ट रुख है कि सरकार को ऐसी ‘कागजी राहत’ देने के बजाय सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के लिए कीमतों में कमी लानी चाहिए। पवन खेड़ा के बयानों ने इस बहस को एक नया आयाम दिया है, जहां सवाल सिर्फ शुल्क कटौती का नहीं, बल्कि इसके वास्तविक लाभार्थियों और सरकार की मंशा का है। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच आगे भी बयानबाजी जारी रहने की उम्मीद है, क्योंकि ईंधन की कीमतें हमेशा से राजनीतिक रूप से एक संवेदनशील विषय रही हैं। हमारी ही खाल उतार कर उसकी जूती बना कर हमें ही पहना कर हम पर अहसान लाद रहे हैं। यह है इस सरकार की खोखली ऊर्जा नीति। यह है इस सरकार का ‘मास्टर स्ट्रोक’!

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